
छत्तीसगढ़ रत्न , डॉ.शिरोमणि माथुर
THE CITY REPORT NEWS@DURG
शाम को मनीषा घर के बरांडे में उदास बैठी थी घर के सामने सड़क पर लोग आ जा रहे थे तभी खेत में काम कर आई कई मजदूर महिलाएं ददरिया गाती हस्ती खिलखिलाती आती दिखाई दी उनके सिर पर खाने के खाली डब्बे खाली टोकनी और हावड़ा थे।
हास परिहास बिखेरते अपने में मगन गीत गाती मजदूर महिलाओं की टोली उसके सामने से जा रही थी उनकी हंसी खुशी को देखकर मनीषा का उदास मन भी खुशी से भर उठा वह सोचने लगी कि उन मजदूर महिलाओं से तो वह कई गुना समृद्ध है फिर भी वह इतनी उदास क्यों रहती है।
मन में प्रश्न उठा कि मैं तो किसी तरह से घर चला रही हूं फिर भी मैं खुश क्यों नहीं यह बहने खेत में मेहनत का काम करने के बाद घर में भी काम करती है और फिर भी कितनी खुश है इतना खुश और निश्चित तो बंगलो में रहने वाली महिलाएं भी नहीं रह पाती होगी उसे अपने पर ग्लानि होने लगी सोचने लगी क्या मैं खुश नहीं रह सकती।
करीब 6 माह पूर्व मनीषा के पति जो किसी कॉलेज में प्रोफेसर थे निलंबित हो गए कॉलेज में कार्यक्रम में आए मंत्री जी को कॉलेज के छात्रों ने अपनी मांगों के संदर्भ में अपमानित कर दिया था मंत्री जी छात्रों के व्यवहार से अपमानित हो चुके थे।
इसलिए उन्होंने प्रिंसिपल सहित कालेज के आठ प्रोफेसर व अकाउंटेंट को बर्खास्त करने का आदेश दे दिए 6 माह तक प्रिंसिपल साहब प्रोफेसर सहायक प्रोफेसर व अकाउंटेंट पर कोई अपराध सिद्ध नहीं हो पाया तो साल भर बाद सभी का निलंबन निरस्त हो गया।
निलंबन के दौरान उनके वेतन की काटी गई राशि भी सभी को वापस मिल गई थी क्या मैं खुश नहीं रह सकती?
मनीषा सोचने लगी—” मैं तो आरामदायक जीवन जी रही हूँ, फिर भी उदास क्यों हूँ?”
वह आत्ममंथन करने लगी। क्या खुशी सुविधाओं से मिलती है? अगर ऐसा होता, तो ये महिलाएँ इतनी खुश न होतीं। उसने महसूस किया कि खुशी बाहरी चीजों पर नहीं, बल्कि हमारे नजरिए पर निर्भर करती है।
मुख्य सीख…
संपन्नता खुशी की गारंटी नहीं होती – कठिन परिश्रम के बावजूद मजदूर महिलाएँ प्रसन्न थीं, जबकि मनीषा दुखी थी।
संतोष ही सच्ची खुशी है – जिनके पास कम है, वे भी खुश रह सकते हैं, अगर वे अपने जीवन को अपनाकर उसका आनंद लें।
आत्मनिरीक्षण जरूरी है – खुशी बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि हमारे मन में छिपी होती है।
हमारी सोच ही दुख या सुख का कारण बनती है – तुलना करने से हम दुखी हो सकते हैं, लेकिन कृतज्ञता से खुशी पा सकते हैं।
निष्कर्ष…
मनीषा को एहसास हुआ कि “खुशी ढूंढनी नहीं पड़ती, उसे महसूस करना पड़ता है।” जीवन में जो कुछ भी है, अगर उसे स्वीकार कर संतोष से जिया जाए, तो हम भी सच्ची खुशी पा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ रत्न, डॉक्टर शिरोमणि माथुर
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